प्रेरणा की उड़ान – “हार को हराने की आदत” : प्रमोद भगत की अदम्य कहानी - by Foot Care Jaipur (Artificial Limb Clinic Since 1998)









 

प्रेरणा की उड़ान –

“हार को हराने की आदत” : प्रमोद भगत की अदम्य कहानी

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डॉ. राजीव अग्रवाल

Clinical Director (Prosthetics & Orthotics)
Foot Care Jaipur (Artificial Limb Clinic Since 1998)

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इस बार कहानी की शुरुआत किसी हादसे से नहीं, एक आदत से करना चाहता हूँ—
हार को हराने की आदत।
क्योंकि कुछ लोग गिरकर खड़े नहीं होते,
वे खड़े रहकर गिरने से इंकार कर देते हैं।

ऐसे ही इंसान हैं Pramod Bhagat


 बचपन से ही अलग रास्ता

प्रमोद भगत को बचपन में पोलियो हुआ।
परिणाम—
 एक पैर में स्थायी कमजोरी
 चाल में असंतुलन
 और समाज की वही पुरानी लाइन— “यह नहीं हो पाएगा”

लेकिन प्रमोद ने कभी खुद से यह नहीं पूछा कि
“मेरे साथ ऐसा क्यों?”
उन्होंने पूछा—
“मैं अब क्या बेहतर कर सकता हूँ?”

यहीं से असली खेल शुरू होता है।


 मानसिक मजबूती: रोज़ की ट्रेनिंग

क्लिनिक में मैं अक्सर देखता हूँ—
लोग सोचते हैं कि
डिसेबिलिटी के साथ सबसे मुश्किल दिन पहला होता है।

असल में सबसे मुश्किल दिन हर दिन होता है
जब आपको फिर से मैदान में उतरना पड़ता है।

प्रमोद की ताकत थी:

  • नियमित अभ्यास

  • अनुशासन

  • और खुद से ईमानदारी

“मैं दूसरों से तेज़ नहीं हूँ,
मैं खुद से हारता नहीं हूँ।”

— यही सोच उन्हें आगे ले गई।


 कोर्ट पर रणनीति, सिर्फ ताकत नहीं

पैरा बैडमिंटन में जीत
केवल हाथ की ताकत से नहीं आती—
वह आती है:

  • सही पोज़िशनिंग

  • संतुलित फुटवर्क

  • और तेज़ निर्णय क्षमता से

प्रमोद ने अपनी शारीरिक सीमा को
रणनीति में बदल दिया
यही वजह है कि वे
दुनिया के सबसे सफल पैरा बैडमिंटन खिलाड़ियों में गिने जाते हैं।


 ऑर्थोसिस और सपोर्ट: छोटा बदलाव, बड़ा असर

पोलियो से प्रभावित खिलाड़ियों के लिए
अक्सर ज़रूरत होती है:

  • बेहतर एंकल–फुट सपोर्ट

  • थकान कम करने वाला ऑर्थोटिक डिजाइन

  • और लोड का सही वितरण

एक Prosthetist–Orthotist के रूप में मैं साफ़ कहना चाहूँगा—
छोटा सा गलत सपोर्ट भी लंबे समय में बड़ा नुकसान कर सकता है।
और सही सपोर्ट, करियर लंबा कर सकता है।


 स्वर्ण पदक से बड़ा संदेश

प्रमोद भगत ने

  • पैरालिंपिक्स में स्वर्ण पदक

  • विश्व स्तर पर नंबर 1 रैंकिंग

  • और वर्षों की निरंतर सफलता

हासिल की।

लेकिन मेरे लिए उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है—
 वे उन बच्चों के लिए उम्मीद हैं
जिन्हें कहा गया था कि “खेल तुम्हारे लिए नहीं है।”


 परिवार और सिस्टम: दिखाई न देने वाला सहारा

प्रमोद की यात्रा में
परिवार, कोच और सपोर्ट स्टाफ
हमेशा पृष्ठभूमि में रहे—
बिना शोर किए, बिना श्रेय माँगे।

मैं हमेशा कहता हूँ—
सफलता मंच पर दिखती है,
लेकिन बनती बैकस्टेज में है।


 Foot Care Jaipur: खेल से जीवन तक

Foot Care Jaipur (Since 1998) में हम यह मानते हैं—

“हर मरीज को चैंपियन नहीं बनना,
लेकिन हर मरीज को दर्द-मुक्त, सुरक्षित और आत्मविश्वासी होना चाहिए।”

हमारा तरीका स्पष्ट है:
 Detailed clinical assessment
 Activity-specific orthotic / prosthetic planning
 Scientific fabrication
 Accurate fitment
 Regular follow-up

क्योंकि लंबी दौड़ वही जीतता है,
जो अपने शरीर को समझकर चलता है।


 मरीजों और परिवारों के लिए मेरा संदेश

अगर आप या आपका कोई प्रिय
Polio residual disability या Orthopedic limitation के साथ जी रहा है, तो याद रखें:

  • सीमा स्थायी हो सकती है, विकास नहीं

  • तुलना से नहीं, सही मार्गदर्शन से आगे बढ़ें

  • सपोर्ट डिवाइस को “आख़िरी विकल्प” न मानें

  • और Qualified & Experienced Prosthetist & Orthotist
    को अपनी टीम का हिस्सा बनाइए


 निष्कर्ष

प्रमोद भगत की कहानी हमें यह सिखाती है—

“हर जीत ज़ोर से नहीं आती,
कुछ जीतें रोज़ की चुप मेहनत से आती हैं।”

दृढ़ निश्चय, अनुशासन, परिवार का साथ
और वैज्ञानिक ऑर्थोटिक / रिहैबिलिटेशन सपोर्ट
एक शारीरिक रूप से सीमित व्यक्ति को
विश्व-स्तरीय विजेता बना सकता है।


डॉ. राजीव अग्रवाल
Clinical Director (Prosthetics & Orthotics)


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