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शरीर से नहीं, मन से विकलांग होना सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो हर सीमितता को ताकत में बदला जा सकता है।

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 जयपुर के एक छोटे से मोहल्ले में रहने वाला आरव बचपन से ही कृत्रिम पैर के सहारे चलता था। एक सड़क दुर्घटना में उसने अपना पैर खो दिया था। शुरू-शुरू में उसे लगता था कि अब उसकी ज़िंदगी दूसरों पर निर्भर होकर ही कटेगी। दोस्तों के साथ खेलना, दौड़ना, साइकिल चलाना — सब मानो उसके जीवन से गायब हो गया था। एक दिन स्कूल में खेल प्रतियोगिता की घोषणा हुई। आरव ने अपने दोस्त से कहा, “काश मैं भी दौड़ पाता…” तभी उसके खेल शिक्षक, शर्मा सर , ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटा, पैर से नहीं, हौसले से दौड़ा जाता है।” यही वाक्य आरव के जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया। उसने अपने अंदर की शक्ति को पहचाना। रोज़ सुबह-शाम अभ्यास करने लगा। कई बार गिरा, चोट लगी, पर हार नहीं मानी। धीरे-धीरे उसने कृत्रिम पैर के साथ संतुलन बनाना सीखा। कुछ महीनों बाद उसी स्कूल में “स्पेशल रन” का आयोजन हुआ। आरव ने भाग लिया। जब दौड़ शुरू हुई, तो बाकी बच्चे उससे आगे निकल गए, पर उसने रुकना नहीं सीखा था। चेहरे पर पसीना, आँखों में जज़्बा और दिल में सिर्फ एक बात — “मैं कर सकता हूँ।” फिनिश लाइन पार करते ही पूरी भीड़ तालियों से गूंज उठी। ...