Diabetic Foot - Neuropathy to Non Healing Ulcers and Amputation - Role of Orthotic Management







 

डायबिटिक फुट: सुन्नपन से न भरने वाले घाव तक — बचाव, नियंत्रण और सही ऑर्थोटिक उपचार की भूमिका

डायबिटीज़ केवल ब्लड शुगर की बीमारी नहीं है—यह पैरों पर धीरे-धीरे, लेकिन गहरा असर डालती है। डायबिटिक न्यूरोपैथी से शुरू होकर न भरने वाले अल्सर तक का सफ़र अक्सर चुपचाप तय होता है। इस लेख में हम डायबिटिक फुट के विभिन्न चरणों, उनकी जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी), नियंत्रण के उपाय, चलने-फिरने की आवश्यकता, और सही तरीके से डिज़ाइन व फिट किए गए ऑर्थोटिक्स की निर्णायक भूमिका को सरल भाषा में समझेंगे। यह मार्गदर्शन Foot Care Jaipur में अपनाई जाने वाली प्रमाणित प्रक्रियाओं और Dr Rajiv Agrawal, Clinical Director (Prosthetics & Orthotics) के अनुभव पर आधारित है।


डायबिटिक फुट की डेमोग्राफी (किसे ज़्यादा जोखिम?)

  • 40+ आयु वर्ग, लंबे समय से डायबिटीज़

  • अनियंत्रित HbA1c, धूम्रपान

  • मोटापा, लंबे समय तक खड़े रहने/चलने की नौकरी

  • पहले से कॉलस/डिफॉर्मिटी, संवेदना (सेन्सेशन) में कमी


डायबिटिक फुट के चरण (Stages)

 प्रारंभिक डायबिटिक न्यूरोपैथी

लक्षण: सुन्नपन, झनझनाहट, जलन; दर्द कम महसूस होना
जोखिम: चोट/घर्षण का पता देर से चलता है
समाधान:

  • नियमित पोडियास्कैन (PODIASCAN) से प्रेशर-मैपिंग

  • कस्टम-मेड सॉफ्ट इनसोल्स द्वारा प्रेशर रिडिस्ट्रिब्यूशन

दबाव बिंदु, कॉलस और स्किन ब्रेकडाउन

लक्षण: तलवे पर मोटी त्वचा (कॉलस), लालिमा
समाधान:

  • कॉलस के नीचे प्रेशर ऑफ-लोडिंग

  • कस्टम ऑर्थोटिक्स

 डायबिटिक फुट अल्सर (न भरने वाले घाव)

लक्षण: घाव का देर से भरना, डिस्चार्ज
समाधान:

  • टोटल कॉन्टैक्ट/ऑफ़-लोडिंग ऑर्थोटिक समाधान

  • वुंड-केयर टीम के साथ समन्वय

 इन्फेक्शन और गैंग्रीन (उन्नत अवस्था)

जोखिम: अस्पताल में भर्ती, सर्जरी का खतरा
समाधान:

  • सख़्त ऑफ-लोडिंग, इमॉबिलाइज़ेशन

  • समय पर विशेषज्ञ हस्तक्षेप

महत्वपूर्ण: हर चरण में सही ऑर्थोटिक प्रिस्क्रिप्शन + सटीक फिटिंग + प्रोटोकॉल-आधारित फॉलो-अप जटिलताओं को रोक सकता है।


“चल नहीं पाते → शुगर बढ़ती → घाव बिगड़ता” — दुष्चक्र को तोड़ना

डायबिटिक अल्सर के कारण चलना कम होता है, गतिविधि घटती है, शुगर नियंत्रण बिगड़ता है और घाव और बिगड़ता है।
समाधान: सुरक्षित मोबिलिटी-फ्रेंडली ऑर्थोटिक्स से नियंत्रित चलना संभव बनाएं—ताकि शुगर कंट्रोल सुधरे और हीलिंग तेज़ हो।


ऑर्थोटिक्स कैसे न्यूरोपैथी को मैनेज करते हैं?

  • प्रेशर रिडिस्ट्रिब्यूशन: हाई-प्रेशर पॉइंट्स से दबाव हटाना

  • शॉक एब्ज़ॉर्प्शन: माइक्रो-ट्रॉमा में कमी

  • स्टेबिलिटी: गलत चाल से बचाव

  • रोकथाम: नए अल्सर का जोखिम कम

Foot Care Jaipur में कस्टम-डिज़ाइन इनसोल्स पोडियास्कैन डेटा पर आधारित होते हैं—हर पैर के लिए अलग।


नियमित PODIASCAN क्यों ज़रूरी?

  • हर 6 महीने में प्रेशर-चेंज ट्रैकिंग

  • इनसोल/फुटवियर को समय पर अपडेट

  • शुरुआती बदलाव पकड़कर बड़ी समस्या से बचाव


Foot Care Jaipur की विशिष्ट प्रक्रिया (Unique Care Pathway)

  1. क्लिनिकल असेसमेंट + न्यूरोपैथी स्क्रीनिंग

  2. PODIASCAN प्रेशर-मैपिंग

  3. कस्टम ऑर्थोटिक डिज़ाइन (मटेरियल चयन सहित)

  4. प्रोटोकॉल-आधारित फिटिंग व एजुकेशन

  5. नियमित फॉलो-अप और डेटा-ड्रिवन एडजस्टमेंट

यह संरचित दृष्टिकोण डॉ. राजीव अग्रवाल के वर्षों के अनुभव से विकसित है और हजारों डायबिटिक पैरों को जटिलताओं से बचाने में सहायक रहा है।


मरीजों के लिए सरल सलाह

  • रोज़ पैरों की जाँच करें

  • नंगे पाँव कम चलें

  • कॉलस/घाव को नज़रअंदाज़ न करें

  • ऑर्थोटिक्स को नियमित उपयोग करें

  • तय अंतराल पर PODIASCAN कराएं


निष्कर्ष

डायबिटिक फुट की यात्रा को शुरुआती न्यूरोपैथी में ही रोकना संभव है—बशर्ते सही समय पर सही ऑर्थोटिक समाधान अपनाया जाए। सुरक्षित चलना, बेहतर शुगर नियंत्रण और जटिलताओं से बचाव—यही लक्ष्य है।



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अस्वीकरण:
इस लेख में दी गई जानकारी केवल स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता एवं शैक्षणिक उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। यह जानकारी सामान्य चिकित्सीय अनुभव, स्वीकृत वैज्ञानिक तथ्यों एवं उपलब्ध चिकित्सा साहित्य पर आधारित है।

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